Sunday, 26 February 2017

Life is not Easy, So Does Success !

Hola, Mates! Hoping you all are doing pretty good in life, if not don't let the negativity grab your mind, it just not your time. Things happen in life in a slow but steady! 
Take a deep breath, try to find what best suits you what you are really good at. Analyze you skill sets take you time in thinking about your pros and cons! 
Trust me when I say cons, you have to very much careful and keeping it (your cons) as a major parameter while taking any decision and setting up your long term goal. 

Most, people do the mistake that they just rush to the conclusion without thinking thoroughly and if you rush for some thing you gown miss all those measure points what you should have taken it very seriously.

At the end of the day, what really matters is, what you have achieved so far, not where you started.

Now, when you are done with everything, and set up the your goal in life. What to do next ?
Trust me, life so majestic it will give you the next step and the fate will start doing his trick which will boost you to your destiny!

This is my all time favorite story that I am sharing with you guys. 
Take few minutes of you precious time, read it! How things will work you will get a very high level picture of it. 
This is the time to start!

"A jobless man applied for the position of 'office boy' at Microsoft.The HR manager interviewed him, then gave him a test: clean the floor. The man passed the test with flying colors."You are hired," HR manager informed the applicant, "give me your e-mail address, and I'll send you the application for employment, as well as the date you should report for work.

Monday, 16 January 2017

काव्य की महत्ता : शब्दों की शक्ति

तुम दे कर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
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'हरिवंश राय 'बच्चन'' की इन पंक्तियों से लगता है की, जो इनमे संबोधित है उससे मैं ( पाठक ) परिचित हूँ/
हाँ, शायद उसी से परिचय है मेरा, जिससे कवि ने अपनी कुंठा व्यक्त की है/ - जैसे मैं  नवागंतुक होऊं कवि के यहाँ, और वो अपने पीछे खड़ी एक लज्जित युवती का परिचय दे रहे हों   /

पाठक को; रचना से, रचना के स्वरुप से, उसमें रचित-चरित्र से  ऐसा सम्बद्ध - लगाव हो जाता है जैसे साक्षात् रचनाकार ही पाठक को सभी 'तत्वों' से परिचय करवा रहे हों  / 

या दूसरी तरह से देखा जाये तो; कहीं ऐसा तो नहीं की  'रचित-चरित्र' के ही माध्यम से अपनी अंतर-द्वन्द्वता का  परिचय दे रहे हों कवि; शायद कवि उस कल्पित युवती को अपना दुखहर्ता समझ बैठा हो, और इसी कारण हम भी उस युवती के बहाने कवि के दर्द को सुन पा रहे हैं /

कविता में एक मिठास होती है जो अपने लय से मन को विभोर करती,  लफ्ज़ सोचने नहीं पड़ते, वे खुद ही जुबान पे आती है, होठ उन्हें गुनगुनाते हैं, ध्वनि तरंगें कहीं फिर छाती से स्फुत्तित होता मालुम पड़ता है ;
मन की कोई कुंठा स्मरण में भी नहीं आती, हमें कुछ भुलाने की जरुरत भी नहीं पड़ती सभी असंगत विचार खुद ही विलोप हो जाती है- सिर्फ लय से नहीं तो उस आंसू , हर्ष , उल्लास के साथ जो लय ले आती है;

आंसू ग़म भुला  देती है - और लय आंसू के साथी बनते हैं

बहने दे, मुझे बहने दे ..
बहने दे घनघोर घटा, बहने दे पानी की तरह
सागर में जा मिलना है, बहने दे नदिया की तरह

मैं समझता हूँ की यह गीत 'आँसू ' की आपकही है. पाठक गौर से शब्दों को सुने तो प्रतीत होगा /
गीतकार ने आंसुओ को लयबद्ध किया और अब 'लय में आँसू' की भी एक लय है जो आँसुओं के बहाव में लय लाती है; और लय- आँसू- लय का द्वंद्व बढ़कर हमारे अंतर-द्वंद्व को चूर करती है /


जब ग़म, आंसुओं से बड़ी हो तो  फिर सचिन देव बर्मन (घाव पे मरहम न कहें तो, ) ढाढस बंधाते  है /


काहे को रोये, चाहे जो होए;
सफल होगी तेरी आराधना 
काहे को रोये ?
 दिया टूटे तो है माती, जले तो ये ज्योति बने,
बहे आंसू तो है पानी, रुके तो ये मोती बने
यह मोती आँखों की पूंजी है, ये न खोये
काहे को रोये

 समां जाये इसमें तूफ़ान जिया तेरा सागर सामान
नजर तेरी काहे नादान छलक गयी  गागर सामान
जाने क्यूँ तूने ये अन्सुं से नैन भिगोये
काहे को रोये

'बच्चन' अपनी वेदना को स्वर देते है :

कह तो सकते हैं, कहकर ही 
कुछ दिल हल्का कर लेते हैं
उस पार अभागे मानव का 
अधिकार न जाने क्या होगा !

-और उनकी  ह्रदय- विचलता व्यक्त होती है
कवि मन तो दुसरे की वेदना का भी अपना दुःख समझता है . 'निराला', 'भिक्षुक' में कहते हैं :

दो टूक कलेजे के करता पछताता 
पथ पर आता।

....

भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?--
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!


'बाबा नागार्जुन' ने 'अकाल और उसके बाद' में दुःख के दिन और और बाद की निश्चिन्तता दोनों को बखूबी दर्शाया है. उन अकाल के दुर्दांत दिनों को नजदीक से देखा है, झेला है, उनके शब्दों को पढ़ कर ही पाठक - कम्पित हो उठे, ऐसा वाज़िब है   (भले उसने अपने जीवन में ऐसे दिन न देखे हों). और तब राहत के दिन को पढ़ वो भी संन्तुष्ट महसूस करता है .
ये है शब्दों का जादू 
  
 कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।


दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद। 


शारांश :

 काव्य की महत्ता - शब्दों की शक्ति

तर्क यहाँ है- ऐसा क्या है कुछ शब्दों में, पंक्तियों में की वो भूले नहीं जाते ? वो है उनकी मिठास, भाव्पुर्नता, जिसके सहित पंक्तियाँ प्रकट की गई है

काव्य, अभिव्यक्ति का एक माध्यम है, यह  हर्ष - दुःख - शोक -उल्लास और जीवन के रंगों का समन्वय लिए जन-जन के समक्ष एक मानसपटल को प्रकट करता है. शब्दों में शक्ति होती है,


Sunday, 28 August 2016

Survival of the fittest: Darwin's theory





"survival of the fittest" term coined by Herbert Spencer, referring Darwin's theory of "Natural Selection" became an expression which led path to wider research area in fields of biology (genetics), understanding evolution forming its niche.


Although Darwin's "Natural Selection" only mentioned of biological aspect,


Evolution by natural selection is a process demonstrated by the observation that more offspring are produced than can possibly survive, along with three facts about populations: 
1) traits variation among individuals
2) different traits leading different rates of survival and reproduction, and
3) traits can be passed to successive generations.

thinkers, sociologists (social scientists) interpreted the theory in different aspects; among of which, some explanation, were apart form Darwin's explanation to which he opposed in his lifetime. As after his death, there is no bar on proposing explanations supporting ideas and even their Propaganda as of Anarchism, Racial Superiority (Racism), eugenics 

The time some ideas struck to write about Darwinism, little was known about it to me, and after studying about it and its concerning topics I would say much has already been said about it.


What I see it today as :

Physio-Psychological fitness

Consider of sportsperson, athletes, they practice hard in sessions, competing other individuals facing same circumstances. one who strives consistently, struggles, goes beyond limit of self, adapts the unfavoring conditions. then gets selected being favored by nature due to his adaptability (i.e. Natural Selection); finally wins in competition leaving others behind.

here success owes to physical fitness (physical adaptability)

For survival in long run one also need psychological fitness, ability to make decisions, facing difficult situation. physio-psychological condition as a whole works in fitness


Darwinism Influencing Despotic Governments

"survival of the fittest". the expression speaks of, as I see, defense of a particular group from unfavorable situations , and soon they get self sufficient they form a urge of attacking approach for the neighboring communities, to exploit nature. they see it as "attacking is best defense" whether or not others bother for same. they put it as- being fit of being civilized early, it is duty on their shoulders to rule the unfit (uncivilized) persons, as if it were a moral obligation on them.this leads to imperialistic ideas.

Darwinism supporting Racism

we also see here somewhere there comes an ideas of racial superiority. Hitler led Nazi Germany and shown much cruelty to Jews as he see it as inferior race to Aryans. he led an Authoritarian government. Romani people also have to face much of racial-discrimination from centuries.

with time anarchist aspect is also being seen; but I see Darwinism has much influenced Anti-philanthropic nature of government,be it be any monarchic, authoritarian, totalitarian oligarchy or even military rule.   Anarchism explanation doesn't well suited in Darwinism



Contributing to Racism and Imperialistic ideas Rudyard Kipling had mentioned in his poem "The White Man's Burden" that - being racially superior and civilized people of Europe, it become their  (White Man's) duty (moral obligation) to civilize the "Third World" 

Take up the White Man's burden, Send forth the best ye breed
Go bind your sons to exile, to serve your captives' need;
To wait in heavy harness, On fluttered folk and wild—
Your new-caught, sullen peoples, Half-devil and half-child 
(1st para of the poem) 


P.S. : It's a individual view. Please refer to appropriate sources for much of Knowledge gaining purpose 

Monday, 18 July 2016

दो रूपए

भाग १.

 हाथ में सिक्के लिए बच्चा उत्साह से दौड़ पड़ा
"धीरे ... दौड़ो मत ...जल्दी आना"
आखिरी शब्द कानों तक पहुंचे उससे पहले वो रेस हो गया

"लेम्चुस" पैसे बढाते हुए बच्चे ने कहा

पैसे देने में एक समर्पण भाव होता है बच्चों में, बशर्ते उन्हें जो चाहिए वो मिले  उन्हें पता होता है की पैसे  दे कर उन्हें टॉफी जरुर मिलेगी जो उन्हें अधिक प्रिय है , सो सिक्के वाले हाथ दूकानदार की ओर तन कर बढे होते हैं

दो रूपए के पाँच टॉफी ले बच्चा सीधे घर को चल पड़ता है



भाग २.

ग्राहक को समोसों का दाम मालूम है, पर:  

"दो समोसे" ग्राहक ने बीस का नोट बढाया
"दो change"
"नहीं है, कितने हुए ?"
"बारह "
"दो रूपए छोड़ दो"

ग्राहक मन ही मन मुस्कराता है - या तो दो रूपए छोड़ो, या आठ खुल्ले घुमाओ; दूसरी बात ज्यादा संभव लगती है उसे
दूकानदार सिक्कों में 'आठ' घुमाता है